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Sleeping
Sleeping
| { | |
| "title": "१. ञाणकथा", | |
| "book_name": "३. पञ्ञावग्गो", | |
| "chapter": "मातिका", | |
| "gathas": [ | |
| "वत्थुसङ्कमना चेव, पञ्ञाय च विवट्टना।", | |
| "आवज्जना बलञ्चेव, पटिसङ्खा विपस्सना॥", | |
| "आरम्मणञ्च पटिसङ्खा, भङ्गञ्च अनुपस्सति।", | |
| "सुञ्ञतो च उपट्ठानं, अधिपञ्ञा विपस्सना॥", | |
| "कुसलो तीसु अनुपस्सनासु, चतस्सो च", | |
| "तयो उपट्ठाने कुसलता, नानादिट्ठीसु न कम्पतीति॥", | |
| "उप्पादञ्च पवत्तञ्च, निमित्तं दुक्खन्ति पस्सति।", | |
| "आयूहनं पटिसन्धिं, ञाणं आदीनवे इदं॥", | |
| "अनुप्पादं अप्पवत्तं, अनिमित्तं सुखन्ति च।", | |
| "अनायूहनं अप्पटिसन्धिं, ञाणं सन्तिपदे इदं॥", | |
| "इदं आदीनवे ञाणं, पञ्चठानेसु जायति।", | |
| "पञ्चठाने सन्तिपदे, दस ञाणे पजानाति।", | |
| "द्विन्नं ञाणानं कुसलता, नानादिट्ठीसु न कम्पतीति॥", | |
| "पटिसङ्खासन्तिट्ठना पञ्ञा, अट्ठ चित्तस्स गोचरा।", | |
| "पुथुज्जनस्स द्वे होन्ति, तयो सेक्खस्स गोचरा।", | |
| "तयो च वीतरागस्स, येहि चित्तं विवट्टति॥", | |
| "अट्ठ समाधिस्स पच्चया, दस ञाणस्स गोचरा।", | |
| "अट्ठारस सङ्खारुपेक्खा, तिण्णं विमोक्खान पच्चया॥", | |
| "इमे अट्ठारसाकारा, पञ्ञा यस्स परिच्चिता।", | |
| "कुसलो सङ्खारुपेक्खासु, नानादिट्ठीसु न कम्पतीति॥", | |
| "सामिसञ्च", | |
| "सञ्ञुत्तञ्च विसञ्ञुत्तं, वुट्ठितञ्च अवुट्ठितं॥", | |
| "अट्ठ समाधिस्स पच्चया, दस ञाणस्स गोचरा।", | |
| "अट्ठारस गोत्रभू धम्मा, तिण्णं विमोक्खान पच्चया॥", | |
| "इमे अट्ठारसाकारा, पञ्ञा यस्स परिच्चिता।", | |
| "कुसलो विवट्टे वुट्ठाने, नानादिट्ठीसु न कम्पतीति॥", | |
| "अजातं झापेति जातेन, झानं तेन पवुच्चति।", | |
| "झानविमोक्खे कुसलता, नानादिट्ठीसु न कम्पति॥", | |
| "समादहित्वा यथा चे विपस्सति, विपस्समानो तथा चे समादहे।", | |
| "विपस्सना च समथो तदा अहु, समानभागा युगनद्धा वत्तरे॥", | |
| "दुक्खा", | |
| "दुभतो वुट्ठिता पञ्ञा, फस्सेति अमतं पदं॥", | |
| "विमोक्खचरियं जानाति, नानत्तेकत्तकोविदो।", | |
| "द्विन्नं ञाणानं कुसलता, नानादिट्ठीसु न कम्पतीति॥", | |
| "सब्बं अभिञ्ञासि यदत्थि नेय्यं, तथागतो तेन समन्तचक्खूति", | |
| "न", | |
| "सब्बं अभिञ्ञासि यदत्थि नेय्यं, तथागतो तेन समन्तचक्खूति॥", | |
| "भवञ्च", | |
| "तेसं निरोधम्हि न हत्थि ञाणं, यत्थायं लोको विपरीतसञ्ञीति॥", | |
| "‘‘यो", | |
| "यथाभूतेधिमुच्चति, भवतण्हा परिक्खया॥", | |
| "‘‘स वे भूतपरिञ्ञातो, वीततण्हो भवाभवे।", | |
| "भूतस्स विभवा भिक्खु, नागच्छति पुनब्भव’’न्ति॥", | |
| "‘‘कोधनो", | |
| "विपन्नदिट्ठि मायावी, तं जञ्ञा वसलो इति’’", | |
| "अक्कोधनो अनुपनाही, विसुद्धो", | |
| "सम्पन्नदिट्ठि मेधावी, तं जञ्ञा अरियो इतीति॥", | |
| "अनुगच्छना", | |
| "सति अज्झत्तविक्खेपा, कङ्खना बहिद्धाविक्खेपपत्थना", | |
| "अस्सासेनाभितुन्नस्स, पस्सासपटिलाभे मुच्छना।", | |
| "पस्सासेनाभितुन्नस्स, अस्सासपटिलाभे मुच्छना॥", | |
| "छ एते उपक्किलेसा, आनापानस्सतिसमाधिस्स।", | |
| "येहि विक्खिप्पमानस्स", | |
| "विमोक्खं अप्पजानन्ता, ते होन्ति परपत्तियाति॥", | |
| "निमित्तं", | |
| "अस्सासं आवज्जमानस्स, निमित्ते चित्तं विकम्पति॥", | |
| "निमित्तं आवज्जमानस्स, पस्सासे विक्खिपते मनो।", | |
| "पस्सासं आवज्जमानस्स, निमित्ते चित्तं विकम्पति॥", | |
| "अस्सासं आवज्जमानस्स, पस्सासे विक्खिपते मनो।", | |
| "पस्सासं आवज्जमानस्स, अस्सासे चित्तं विकम्पति॥", | |
| "छ एते उपक्किलेसा, आनापानस्सतिसमाधिस्स।", | |
| "येहि विक्खिप्पमानस्स, नो च चित्तं विमुच्चति।", | |
| "विमोक्खं अप्पजानन्ता, ते होन्ति परपत्तियाति॥", | |
| "अतीतानुधावनं चित्तं, अनागतपटिकङ्खनं लीनं।", | |
| "अतिपग्गहितं अभिनतं, अपनतं चित्तं न समाधियति॥", | |
| "छ एते उपक्किलेसा, आनापानस्सतिसमाधिस्स।", | |
| "येहि", | |
| "आनापानस्सति यस्स, परिपुण्णा अभाविता।", | |
| "कायोपि इञ्जितो होति, चित्तम्पि होति इञ्जितं।", | |
| "कायोपि फन्दितो होति, चित्तम्पि होति फन्दितं॥", | |
| "आनापानस्सति", | |
| "कायोपि अनिञ्जितो होति, चित्तम्पि होति अनिञ्जितं।", | |
| "कायोपि", | |
| "निमित्तं अस्सासपस्सासा, अनारम्मणमेकचित्तस्स।", | |
| "अजानतो च तयो धम्मे, भावना नुपलब्भति॥", | |
| "निमित्तं", | |
| "जानतो च तयो धम्मे, भावना उपलब्भतीति॥", | |
| "आनापानस्सति यस्स, परिपुण्णा सुभाविता।", | |
| "अनुपुब्बं परिचिता, यथा बुद्धेन देसिता।", | |
| "सो इमं लोकं पभासेति, अब्भा मुत्तोव चन्दिमाति॥", | |
| "न तस्स अद्दिट्ठमिधत्थि किञ्चि, अथो अविञ्ञातमजानितब्बं।", | |
| "सब्बं अभिञ्ञासि यदत्थि नेय्यं, तथागतो तेन समन्तचक्खूति॥", | |
| "‘‘अनिच्चे", | |
| "अनत्तनि च अत्ताति", | |
| "मिच्छादिट्ठिहता सत्ता, खित्तचित्ता विसञ्ञिनो॥", | |
| "‘‘ते", | |
| "सत्ता गच्छन्ति संसारं, जातिमरणगामिनो॥", | |
| "‘‘यदा च बुद्धा लोकस्मिं, उप्पज्जन्ति पभङ्करा।", | |
| "ते इमं धम्मं पकासेन्ति, दुक्खूपसमगामिनं॥", | |
| "‘‘तेसं सुत्वान सप्पञ्ञा, सचित्तं पच्चलद्धु", | |
| "अनिच्चं अनिच्चतो दक्खुं, दुक्खमद्दक्खु दुक्खतो॥", | |
| "‘‘अनत्तनि", | |
| "सम्मादिट्ठिसमादाना, सब्बं दुक्खं उपच्चगु’’न्ति॥", | |
| "ञाणदिट्ठी", | |
| "गतिकम्मविपल्लासा, मग्गो मण्डेन ते दसाति॥", | |
| "ओभासे चेव ञाणे च, पीतिया च विकम्पति।", | |
| "पस्सद्धिया सुखे चेव, येहि चित्तं पवेधति॥", | |
| "अधिमोक्खे", | |
| "उपेक्खावज्जनाय चेव, उपेक्खाय च निकन्तिया॥", | |
| "इमानि दस ठानानि, पञ्ञा यस्स परिच्चिता।", | |
| "धम्मुद्धच्चकुसलो होति, न च सम्मोह गच्छति॥", | |
| "विक्खिपति चेव किलिस्सति च, चवति चित्तभावना।", | |
| "विक्खिपति", | |
| "विक्खिपति न किलिस्सति, भावना न परिहायति।", | |
| "न च विक्खिपते चित्तं न किलिस्सति, न चवति चित्तभावना॥", | |
| "युगनद्धा सच्चबोज्झङ्गा, मेत्ता विरागपञ्चमा।", | |
| "पटिसम्भिदा धम्मचक्कं, लोकुत्तरबलसुञ्ञाति॥", | |
| "पञ्चवीसति", | |
| "सतं पञ्चवीसति चेव, यानि दुक्खे पवुच्चरेति॥", | |
| "पञ्ञा", | |
| "पाटिहारि समसीसि, सतिपट्ठाना विपस्सना।", | |
| "ततिये पञ्ञावग्गम्हि, मातिकाय च ते दसाति॥", | |
| "महावग्गो युगनद्धो, पञ्ञावग्गो च नामतो।", | |
| "तयोव वग्गा इमम्हि", | |
| "अनन्तनयमग्गेसु, गम्भीरो सागरूपमो।", | |
| "नभञ्च तारकाकिण्णं, थूलो जातस्सरो यथा।", | |
| "कथिकानं विसालाय, योगीनं ञाणजोतनन्ति॥" | |
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